(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.4. अध्यायः 004
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
दुर्योधनेन स्वयंवरमण्टपे कलिङ्गराजकन्याहरणम्॥ 1॥ कर्णेन तमनुद्रुतवतो राज्ञां पराजयः॥ 2॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

नारद उवाच। 12-4-0x(6710)(80999)
कर्णस्तु समवाप्यैवमस्त्रं भार्गवनन्दनात्।
दुर्योधनेन सहितो मुमुदे भरतर्षभ॥ 12-4-1(81000)
ततः कदाचिदाजातः समाजग्मुः स्वयंवरे।
कलिङ्गविषये राजन्राज्ञश्चित्राङ्गदस्य च॥ 12-4-2(81001)
श्रीमद्राजपुरं नाम नगरं तत्र भारत।
राजानः शतशस्तत्र कन्यार्थे समुपागमन्॥ 12-4-3(81002)
श्रुत्वा दुर्योधनस्तत्र समेतान्सर्वपार्थिवान्।
रथेन काञ्चनाङ्गेन कर्णेन सहितो ययौ॥ 12-4-4(81003)
ततः स्वयंवरे तस्मिन्नानादेश्या महारथाः।
समाजग्मुर्नृपतयः कन्यार्थे नृपसत्तम॥ 12-4-5(81004)
शिशुपालो जरासन्धो भीष्मको वक्र एव च।
कपोतरोमा नीलश्च रुक्मी च दृढविक्रमः॥ 12-4-6(81005)
सृगालश्च महाराजः स्त्रीराज्याधिपतिश्च यः।
विशोकः शतधन्वा च भोजो वीरश्च नामतः॥ 12-4-7(81006)
एते चान्ये च बहवो दक्षिणां दिशमाश्रिताः।
म्लेच्छाश्चार्याश्च राजानः प्राच्योदीच्यास्तथैव च॥ 12-4-8(81007)
काञ्चनाङ्गदिनः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभाः।
सर्वे भास्वरदेहाश्च व्याघ्रा इव बलोत्कटाः॥ 12-4-9(81008)
ततः समुपविष्टेषु तेषु राजसु भारत।
विवेश रङ्गं सा कन्या धात्रीवर्षवरान्विता॥ 12-4-10(81009)
ततः संश्राव्यमाणेषु राज्ञां नामसु भारत।
अत्यक्रामद्धार्तराष्ट्रं सा कन्या वरवर्णिनी॥ 12-4-11(81010)
दुर्योधनस्तु कौरव्यो नामर्षयत लङ्घनम्।
प्रत्यपेधच्च तां कन्यामसत्कृत्य नराधिपान्॥ 12-4-12(81011)
स वीर्यमदमत्तत्वाद्भीष्मद्रोणावुपाश्रितः।
रथमारोप्य तां कन्यामाजुहाव नराधिपान्॥ 12-4-13(81012)
तमन्वगाद्रथी खङ्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्।
कर्णः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः पृष्ठतः पुरुषर्षभ॥ 12-4-14(81013)
ततो विमर्दः सुमहान्राज्ञामासीद्युयुत्सताम्।
सन्नह्यतां तनुत्राणि रथान्योजयतामपि। 12-4-15(81014)
तेऽभ्यधावन्त संक्रुद्धाः कर्णदुर्योधनावुभौ।
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो मेघाः पर्वतयोरिव॥ 12-4-16(81015)
कर्णस्तेषामापततामेकैकेन शरेण ह।
धनूंषि च शरव्रातान्पातयामास भूतले॥ 12-4-17(81016)
ततो विधनुषः कांश्चित्कांश्चिदुद्यतकार्मुकान्।
कांश्चिदुत्सृजतो बाणान्रथशक्तिगदास्तथा॥ 12-4-18(81017)
लाघवाव्द्याकुलीकृत्य कर्णः प्रहरतां वरः।
हतसूतांश्च भूयिष्ठान्स विजिग्ये नराधिपान्॥ 12-4-19(81018)
ते स्वयं वाहयन्तोऽश्वान्याहि याहीति वादिनः।
व्यपेयुस्ते रणं हित्वा राजानो भग्नमानसाः॥ 12-4-20(81019)
दुर्योधनस्तु कर्णेन पाल्यमानोऽभ्ययात्तदा।
हृष्टः कन्यामुपादाय नगरं नागसाह्वयम्॥ ॥ 12-4-21(81020)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि चतुर्थोऽध्यायः॥ 4॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-4-2 विषये देशे॥ 12-4-6 भीष्मको बक एव चेति थ. पाठः॥ 12-4-7 त्रैलोक्याधिपतिश्च य इति ट. ड. पाठः। त्रैराज्येति थ. पाठ॥ 12-4-10 वर्षवरः षण्ढः॥ 12-4-17 शिरांसि सशरांश्चापानिति ट. ड. थ. पाठः॥ 12-4-20 व्यपेयुः व्यपगताः॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.